Ishwar Bhi Pareshan Hai Vishnu Nagar

ISBN: 9788126724284

Published: 2013

Hardcover

215 pages


Description

Ishwar Bhi Pareshan Hai  by  Vishnu Nagar

Ishwar Bhi Pareshan Hai by Vishnu Nagar
2013 | Hardcover | PDF, EPUB, FB2, DjVu, audiobook, mp3, RTF | 215 pages | ISBN: 9788126724284 | 3.74 Mb

ईशवर भी परेशान है विषणु नागर की वयंगयधरमिता का रोचक उदाहरण है। समकालीन हिनदी वयंगय की गहमागहमी में उनकी शैली अलग से पहचानी जाती है। सामाजिक परिवरतन के भीतर सकरिय अनतरविरोधों की पहचान, राजनीतिक महततवाकांकषाओं के मलिन मुख और निजी जीवन में नैतिकता केMoreईश्वर भी परेशान है विष्णु नागर की व्यंग्यधर्मिता का रोचक उदाहरण है। समकालीन हिन्दी व्यंग्य की गहमागहमी में उनकी शैली अलग से पहचानी जाती है। सामाजिक परिवर्तन के भीतर सक्रिय अन्तर्विरोधों की पहचान, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के मलिन मुख और निजी जीवन में नैतिकता के चक्रव्यूह आदि को बूझने मेँ विष्णु नागर का जवाब नहीं। यही वजह है कि वे कम शब्दों में प्रभावपूर्ण ढंग से विसंगतियों पर प्रहार करतें है।विष्णु नागर के इस व्यंग्य संग्रह की एक ओर विशेषता पाठक का ध्यान खींचती है। वह है, सामाजिक घटनाओं या प्रसंगों पर लेखन की चुटीली टिप्पणियाँ। लोकतंत्र की लीला में प्रतिक्षण ऐसे कार्य होते और दिखते है जो विडम्बनाओं से भरे होते है। इन कार्यों मेँ छिपे मन्तव्यों पर उँगली टिकाते हुए लेखक ने उन्हें उजागर किया है। मतदाता उछलो मत!

में विष्णु नागर लिखते है कि हे बेटा, आज अकड़ लो!...कल हमारे द्वार पर हुजूर कहते हुए आओगे, गिड़गिड़आओगे, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम क्या हो और हम क्या हैं। … तब तुम्हें पता चलेगा कि हम किसके थे, किसके हैं और किसके रहेंगे।पुरानी उक्ति है कि कठिन बात सरलता से कह जाना मुश्किल काम है। विष्णु नागर ने अपनी व्यंजनापूर्ण भाषा से यहीँ काम किया है।



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